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Wednesday, April 22, 2015

कद्दू カボチャ Pumpkin


"कद्दू"  カボチャ  Pumpkin

कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और संतरी कद्दू में केरोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। बीटा केरोटीन एंटीऑक्सीडेंट होता है जो शरीर में फ्री रैडिकल से निपटने में मदद करता है। कद्दू ठंडक पहुंचाने वाला होता है। इसे डंठल की ओर से काटकर तलवों पर रगड़ने से शरीर की गर्मी खत्म होती है। कद्दू लंबे समय के बुखार में भी असरकारी होता है। इससे बदन की हरारत या उसका आभास दूर होता है।

カボチャにβ-カロテンがあるためビタミンAがたっぷりである。黄色とオレンジ色のカボチャにケロテンの量が多いほうである。β-カロテンは抗酸化物質ですのでアンチエージング特徴がある。カボチャは体を冷やす効果がある。カボチャの茎を切って足裏にこするこで体を冷やす効果がある。長期間熱のときもカボチャが良いです。

Pumpkin mainly has beta karoten, which gives Vitamin A. Yellow and orange color pumpkin has more quantity of beta keroten. Beta keroten is antioxidant which helps in reducing Free radicals from the body. Pumpkin helps in cooling of body temperature. Rubbing of pumpkin stem to foot-sole helps in body cooling. Good for reducing temperature in long fever.


कद्दू का रस भी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। यह मूत्रवर्धक होता है और पेट संबंधी गड़बड़ियों में भी लाभकारी रहता है। यह खून में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करने में सहायक होता है और अग्नयाशय को भी सक्रिय करता है। इसी वजह से चिकित्सक मधुमेह के रोगियों को कद्दू के सेवन की सलाह देते हैं।


カボチャのジュースも健康に良いでしょう。これは排尿促進によくておなかのさまざまな問題に良いでしょう。
体の血にある砂糖をコントロールし消化の仕組みをよくする効果がある。
ですので医者さんは糖尿病の患者さんにカボチャを推奨されます。

Pumpkin juice is also very good for health. It is diuretic and helps in curing different stomach related problems. It helps in controlling blood sugar and activate digestive system. That is the reason why doctors recommend pumpkin to diabetic patients.



कद्दू खाने के स्वास्थ्य लाभ कद्दू के स्वास्थ्य लाभ-

✏1. एंटीऑक्सीडेंट से भरा- कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और संतरी कद्दू में केरोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। बीटा केरोटीन एंटी-ऑक्सीडेंट होता है जो शरीर में फ्री रैडिकल से निपटने में मदद करता है।

✏2. ठंडक पहुंचाए- कद्दू ठंडक पहुंचाने वाला होता है। इसे डंठल की ओर से काटकर तलवों पर रगड़ने से शरीर की गर्मी खत्म होती है। कद्दू लंबे समय के बुखार में भी असरकारी होता है। इससे बदन की हरारत या उसका आभास दूर होता है।

✏3. मन को शांति पहुंचाए- कद्दू में कुछ ऐसे मिनरल्स होते हैं जो दिमाग की नसों को आराम पहुंचाते हैं। अगर आपको रिलैक्स होना है तो आप कद्दू खा सकते हैं।

✏हृदयरोगियों के लिये-
आहार विशेषज्ञों का कहना है कि कद्दू हृदयरोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। यह कोलेस्ट्राल कम करता है, ठंडक पहुंचाने वाला और मूत्रवर्धक होता है।

✏मधुमेह रोगियों के लिये-
कद्दू रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है और अग्न्याशय को सक्रिय करता है। इसी कारण चिकित्सक मधुमेह रोगियों को कद्दू खाने की सलाह देते हैं। इसका रस भी स्वास्थ्यवर्धक माना गया है।

✏आयरन से भरपूर्ण-
कई महिलाओं में आयरन की कमी हो जाती है जिससे उन्हें एनीमिया हो जाता है। तो ऐसे में कद्दू सस्ता भी पड़ता है और पौष्टिक भी होता है। कद्दू के बीज भी आयरन, जिंक, पोटेशियम और मैग्नीशियम के अच्छे स्रोत हैं।

✏फाइबर-
इसमे खूब रेशा यानी की फाइबर होता है जिससे पेट हमेशा साफ रहता है।

Friday, June 27, 2014

गहरी सुखभरी नींद ऐसे लें 熟睡のために

गहरी सुखभरी नींद ऐसे लें 
熟睡のために

अनिद्रा आज का सबसे बड़ा रोग है, वस्तुतः युवा के लिए छः घंटे की नींद पर्याप्त होती है। बच्चों के लिए आठ घंटे और वृद्धों को चार से छः घंटे की नींद की आवश्यकता होती है।

現時代は不眠症が一番の病気です。若者は6時間ぐらいの睡眠時間が充分です。
子供が8時間とお年寄りは4ー6時間の睡眠時間が必要です。


प्राकृतिक उपचार

प्राकृतिक उपचार से अनिद्रा रोग समूल नष्ट हो जाता है, रोगी पर कोई दुष्प्रभाव भी नहीं पड़ता।

१. एक चम्मच प्याज के रस में एक चम्मच शहद मिलाकर चाटें। यह औषधि रात को सोने से पहले लें।

२. रात को सोने से पहले नियमित सरसों या तिल के तेल से पांच मिनट पैर के तलवों की मालिश करें, इससे थकान दूर होती है और नींद अच्छी आती है।

३. पपीता एक बहुत ही गुणकारी और स्वादिष्ट फल है। अनिद्रा के रोगी नियमित रूप से पपीता खायें, उसका रस पीयें और कच्चे पपीते की सब्जी बनाकर खायें तो उन्हें अनिद्रा की शिकायत नहीं होगी।

४. सौंफ अनिद्रा रोग की बेहतर औषधि है। रात को सोने से पूर्व १० ग्राम सौंफ एक कप पानी में उबाल-छानकर पियें।

६. सेब का मुरब्बा अनिद्रा रोग को शांत कर गहरी नींद लाता है - रात को भोजन के बाद नियमित रूप से खाने वालों को रोग से मुक्ति मिलती है।

自然的な治療

自然的な治療で不眠症が治り、患者に副作用もありません。
下記の色々なやり方がありますが、全部やる必要は有りません。

1. 1スプーン玉ねぎのジュースに1スプーンハチミツを混ぜてなめます。毎日寝る前にやります。

2. 夜寝る前にマスタード油かごま油で足下の裏に5分ぐらいマッサージをする。これも寝る直前に最高です。

3. パパイヤはおいしくてすごいオーシャディです。不眠症の患者さんはパパイヤを定期的に食べたり、パパイヤのジュースを飲んだり、未熟のカレーを食べると熟睡を得るようになります。

4. ソーンフは不眠症にすごくききます。寝る前に10グラムソーンフを1杯カップに入れ、ボイルしてからフィルタして飲みます。

5. リンゴのコンポートは不眠症を冷静にし、熟睡の為に手伝います。毎日夕食後食べると熟睡を得るようになります。

これから熟睡をもらえるように試してみましょう!

Monday, June 23, 2014

दूध से दाढ़ी बनाने और नहाने का उत्तम तरीका

दूध से दाढ़ी बनाने और नहाने का उत्तम तरीका 


दूध से दाढ़ी बनाने और नहाने सुनकर शायद आपको अजीब लगे, पर है यह ज़ोरदार तरीका। दूध से दाढ़ी बनाने का सामान्य तरीका यह है कि पहले आप हलके गुनगुने पानी से चेहरा भिगो लीजिए, इसके बाद थोड़ा सा कच्चा दूध लेकर चेहरे पर अच्छी तरह मलिए। अब रेज़र चलाइये, एकदम चिकनी दाढ़ी बनेगी। दाढ़ी बनाने के बाद क्रीम वग़ैरह लगाने की ज़रूरत एकदम समाप्त हो जाती है, क्योंकि कच्चा दूध अव्वल दर्ज़े का 'क्लींजिंग एजेंट' है। कच्चे दूध के इस्तेमाल से चेहरे की स्निग्धता और सौंदर्य में वृद्धि होगी, सो अलग। 

अब आइए, दूध से स्नान करने का तरीका जानिए। यह तरीका भी एकदम आसान है। एक नींबू एक छोटी कटोरी भर कच्चे दूध में निचोड़ दीजिए, बस अच्छे से अच्छे से भी बेहतर स्नान सामग्री तैयार है। नींबू निचोड़ने के बाद जब दूध फट जाए तो एक साफ़ सूती कपड़े का टुकड़ा इसमें भिगोकर शरीर पर अच्छी तरह रगड़ते हुए फेरिए और स्नान कर लीजिए। यह है आपका एकदम - सौ प्रतिशत सम्पूर्ण स्नान !

इस तरह आप साबुनों के नुकसानदेह मायाजाल से तो बचेंगे ही, तमाम तरह के चर्मरोगों से भी निजाद मिलेगा। 

स्रोत:
स्वदेशी चिकित्सा - गंभीर रोगों की घरेलु चिकित्सा एवं सौंदर्य वर्धक घरेलू नुस्खे (भाग - ४) 
संकलन एवं संपादन: राजीव दिक्षित

नोट: इस पुस्तक को खरीदने के लिए राजीव दिक्षित मेमोरियल स्वदेशी उत्थान संस्था से संपर्क करें। 

Friday, June 6, 2014

पाचन तन्त्र के लिये वरदान 消化を助ける効果

पाचन तन्त्र के लिये वरदान
消化酵素の分泌を促し、消化を助ける効果

प्रयोग करके देखें
やってみましょう!


जठराग्नि प्रदीप्त करने के लिय पाचक रस ज्यादा चाहिय। एक मीठे सेव फल में कितने भी लौंग अन्दर भौंक (अंदर तक गड़ाना) दो, फिर उसे 7 से 11 दिन तक छाया में पड़ा रहने दें। वह लौंग बन गयी पाचन तन्त्र को तेज करने वाली औषधि या टॉनिक। यह लौंग पाचन तन्त्र के लिय एकदम वरदान है। लौंग धोकर छाया में सुखा लें, और प्रयोग करें।

食べたものを消化するには、胃腸の消化酵素がたくさん必要になります。一個の甘い新鮮なリンゴにローング(クローブ)を隙間なくさして、7日ー11日間ぐらい放置すると、ローングが柔らかくなります。これを水で軽く洗って、直射日光を避けて乾かせば、オーシャディになります。このローングは消化酵素の分泌を促し、消化を助けてくれます。

मात्रा: प्रतिदिन 1-2 लौंग भोजन के 2 घंटे बाद चूसें।

使い方:毎日、食後2時間ぐらいあとに1ー2個のローングを口に含み、柔らかくなるまで口の中で溶かします。

Saturday, May 24, 2014

मिट्टी के बर्तनों का उपयोग कर भोजन को स्वादिष्ट एवं पौष्टिक बनाएं।

मिट्टी के बर्तनों का उपयोग कर भोजन को स्वादिष्ट एवं पौष्टिक बनाएं। 

मिट्टी के अंदर मौजूद १८ प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्व भोजन को स्वादिष्ट एवं पौष्टिक बनती है। 


हजारों वर्षों से हमारे यहाँ मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता आया है अभी कुछ वर्षों पूर्व तक गाँवों में वैवाहिक कार्यक्रमों में तो मिट्टी के बर्तन ही उपयोग में आते थे। घरों में दाल पकाने, दूध गर्म करने, दही जमाने, चावल बनाने और अचार रखने के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता रहा है। मिट्टी के बर्तन में जो भोजन पकता है उसमें सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी नहीं होती जबकि प्रेशर कुकर व अन्य बर्तनों में भोजन पकाने से सूक्ष्म पोषक तत्व कम हो जाते हैं जिससे हमारे भोजन की पौष्टिकता कम हो जाती है। भोजन को धीरे-धीरे ही पकना चाहिये तभी वह पौष्टिक और स्वादिष्ट पकेगा और उसके सभी सूक्ष्म पोषक तत्व सुरक्षित रहेंगे । 

महर्षि वागभट्ट जी के अनुसार भोजन को पकाते समय उसे सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श मिलना आवश्यक है जबकि प्रेशर कुकर में पकाते समय भोजन को ना तो सूर्य का प्रकाश और ना ही पवन का स्पर्श मिल पाता, जिससे उसके सारे पोषक तत्व क्षींण हो जाते हैं । और प्रेशर कुकर एल्यूमीनियम का बना होता है जो कि भोजन पकाने के लिये सबसे घटिया धातु है क्योंकि एल्यूमीनियम भारी धातु होती है और यह हमारे शरीर से अपशिष्ट पदार्थ के रूप में बाहर नहीं निकल पाती है । इसी कारण एल्यूमीनियम के बर्तनों का उपयोग करने से कर्इ प्रकार के गंभीर रोग होते हैं जैसे अस्थमा, वात रोग, टी.बी. मधुमेह (डायबिटीज), पक्षाघात (पेरेलिसिस), स्मरण शक्ति का कम होना आदि! वैसे भी भाप के दबाव से भोजन उबल जाता है पकता नहीं है। 

आयुर्वेद के अनुसार जो भोजन धीरे-धीरे पकता है वह भोजन सबसे अधिक पौष्टिक होता है । भोजन को शीघ्र पकाने के लिये अधिक तापमान का उपयोग करना सबसे हानिकारक है। हमारे शरीर को प्रतिदिन 18 प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्व चाहिए जो मिट्टी से ही आते है। जैसे- Calcium, Magnesium, Sulphur, Iron, Silicon, Cobalt, Gypsum आदि। मिट्टी के इन्ही गुणों और पवित्रता के कारण हमारे यहाँ पुरी के मंदिरों (उड़ीसा) के अलावा कर्इ मंदिरों में आज भी मिट्टी के बर्तनों में प्रसाद बनता है। अधिक जानकारी के लिए पुरी के मंदिर की रसोर्इ देखें।  

मैंने तो स्वयं अपने घर में प्रतिदिन मिट्टी की हांड़ी में सब्ज़ी, दूध आदि पकाने की शुरुवात कर दी है। 
और मेरा आपसे भी आग्रह है की एक बार आप भी अपने घर में मिट्टी की हांड़ी में सब्ज़ी पका कर देखिये आप खुद फर्क महसूस करेंगे। 

स्रोत:



Saturday, May 10, 2014

त्रिदोष सिद्धांत - वात, पित्त व कफ

त्रिदोष सिद्धांत - वात, पित्त व कफ

वात, पित्त एवं कफ ये तीन दोष शरीर में जाने जाते है। ये दोष यदि विकृत हो जाएं तो शरीर को हानि पहुंचाते हैं, और मृत्यू का कारन बन जाते हैं। यदि ये वात, पित्त, एवं कफ सामान्य रूप से संतुलन में रहें तो शरीर की सभी क्रियाओं का संचालन करते हुऐ शरीर का पोषण करते है यधपि ये वात, पित्त, कफ शरीर के सभी भागों में रहते हैं, लेकिन विशेष रूप से वात नाभि के नीचे वाले भाग में, पित्त नाभि और हृदय के बीच में, कफ हृदय से ऊपर वाले भाग में रहता है।



आयु के अन्त में अर्थात वृद्धावस्था में वायु (वात) का प्रकोप होता है। युवा अवस्था में पित्त का असर होता है।  बाल्य अवस्था में कफ का असर होता है। इसी तरह दिन के प्रथम पहर अर्थात सुबह के समय कफ का प्रभाव होता है दिन के मध्य में पित्त का प्रभाव होता है। दिन के अन्त में वात का प्रभाव होता है। सुबह कफ, दोपहर को पित्त और शाम को वात (वायु) का असर होता है। 

जब व्यक्ति बाल्य अवस्था में होता है, उस समय कफ की प्रधानता होती है। बचपन में मुख्य भोजन दूध होता है। बालक को अधिक चलना-फिरना नहीं होता है। बाल्य अवस्था में किसी भी तरह की चिन्ता नहीं होती है। अत: शरीर में स्निग्ध, शीत जैसे गुणों से युक्त कफ अधिक बनता है। युवा अवस्था में शरीर में धातुओं का बनना अधिक होता है, साथ ही रक्त निर्माण अधिक होता है। रक्त का निर्माण करने में पित्त की सबसे बड़ी भूमिका होती है। युवा अवस्था में शारीरिक व्यायाम भी अधिक होता है। इसी कारण भूख भी अधिक लगती है। ऐसी स्थिति में पित्त की अधिकता रहती है। युवा अवस्था में पित्त का बढ़ना बहुत ज़रूरी होता है। यदि पित्त ना बढ़े तो शरीर में रक्त की कमी हो जाएगी और शरीर को पुष्ट करने वाली धातुओं का भी निर्माण नहीं होगा। पित्त के गुण है। - तीक्षण, उष्ण।

वृद्धा अवस्था में शरीर क्षय होने लगता है। सभी धातुयें शरीर में कम होती जाती है। शरीर में रूक्षता बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में शरीर में वायु (वात) का प्रभाव बढ़ जाता है। वायु का गुण रूक्ष एवं गति है।

समय विभाजन के अनुसार दिन के प्रथम पहर में शीत या ठंड की अधिकता होती है। इसके कारण शरीर में थोड़ा भारीपन होता है। इसी कारण कफ में वृद्धि होती है। दिन के दूसरे पहर में और मध्यकाल में सूर्य की किरणें काफी तेज हो जाती है। गर्मी बढ़ जाती है। इस समय पित्त अधिक हो जाता है। अत: दिन के दूसरे पहर एवं मध्यकाल में पित्त प्रबल होता है। दिन के तीसरे और सांयकाल सूर्य किरणों के मन्द हो जाने के कारण वायु का प्रभाव बढ़ता है। इसी तरह रात्रि के प्रथम पहर में कफ की वृद्धि होती है। रात्रि के दूसरे पहर में वात (वायु) की वृद्धि होती है। चूंकि रात्रि के तीसरे पहर या अन्तिम पहर में वातावरण में भी शीतल वायु बहती है, अत: शरीर के इसी वायु के संपर्क में आ जाने से शरीर में भी वायु बढ़ जाती है।

इसी तरह खाने-पीने के समय का वात, पित्त, कफ के साथ्ज्ञ मेल है। खाने को खाते समय कफ की मात्रा शरीर में अधिक होती है। खाने के बाद जब भोजन के पाचन की क्रिया शुरू होती है, उस समय पित्त की प्रधानता रहती है। भोजन में पाचन के बाद वायु की प्रधानता होती है। भोजन कफ के साथ ही मिलकर आमाशय में पहुँचता है। मुंह में बनने वाली लार क्षारीय होती है। आमाशय में जो स्त्राव होता है, वह अम्लीय है। अत: भोजन को खाते समय लार भोजन के साथ मिलकर आमाशय में पहुंचती है, जहाँ उसमे अम्ल मिलता है। अम्ल और क्षार के संयोग से भोजन मधुर (मृदु) होता है। भोजन के मधुर होने से ही आमाशय में कफ की वृद्धि होती है। भोजन जब आमाशय से आगे चलता है तो फिर पित्त की क्रिया शुरू होती है। इस पित्त के बढ़ने से अग्नि प्रदीप्त होती है, जो भोजन को जलाकर रस में बदल देती है। भोजन के रस में बदल जाने के बाद ही इसमें से मांस, मज्जा, रक्त, वीर्य, मल-मूत्र आदि बनते है और इस स्तर पर वायु की अधिकता होती है। इस वायु के कारण ही मल-मूत्र का शरीर से निकलना होता है। इस तरह शरीर में प्रतिदिन प्राकृतिक रूप से वात, पित्त, कफ में वृद्धि होती रहती है। यह प्राकृतिक वृद्धि ही शरीर की रक्षा करती है। इस प्राकृतिक तरीके से होने वाली वात, पित्त, कफ की वृद्धि शरीर में बाधा उत्पन नहीं करती है,बल्कि शरीर की क्रियाओं में सहायक रूप होती है। इसके विपरीत जब गलत आहार-विहार के कारण  वात, पित्त, कफ में वृद्धि होती है,तब शरीर हो हानि होती है और बीमारियाँ होती जाती है।

यदि शरीर में वात आदि दोषों की प्रधानता होती है तो उसका जठराग्नि पर प्रभाव पड़ता है। यदि वायु विषमगति हो जाए तो, पाचन क्रिया कभी नियमित और कभी अनियमित हो जाती है। पित्त अपने तीक्षण गुणों के कारण अग्नि को तीव्र कर खाये हुऐ आहार को समय से पहले ही पचा देती है। कफ अपने मृदु गुण के कारण अग्नि को मृदु बनाकर उचित मात्रा में खाये हुऐ आहार का सम्यक पाचन नियमित समय में नहीं कर पता है। यदि वात, पित्त और कफ तीनों समान मात्रा में रहें तो उचित मात्रा में खाये हुऐ आहार का निश्चित समय से पाचन हो जाता है। 

वात की वृद्धि से मलाशय पर प्रभाव पड़ता है। मलद्वार में क्रूरता बढ़ती है। इससे मलत्याग देरी से होता है। पित्त की वृद्धि से मलाशय मृदु होता है। कफ की वृद्धि से यही मलाशय मध्ये होता है। यदि वात, पित्त, कफ समान है,तो मलाशय एवं मलद्वार मध्य होता है। 

 यदि कोई व्यक्ति वात प्रकृति का है या उसके पेट में वायु का प्रभाव बढ़ गया है तो उसका कोष्ठ क्रूर होगा। अर्थात उस व्यक्ति को मलत्याग में देरी से होगा। इसी को कोष्ठवृद्धता भी कहते है। इसको ठीक करने के लिए औषधि की ज़रूरत होती है। ऐसी औषधि जो वात को काम करे और पित्त को बढ़ाये। जैसे ही पित्त बढ़ता है,वैसे ही कोष्ठ मृदु हो जाता है। कोष्ठ मृदु हो जाये तो मलत्याग आसान हो जाता है। मलत्याग आसान करने के लिए दूध,त्रिफलाचूर्ण बहुत अच्छी औषधियाँ है। मलत्याग करना सबसे अधिक आसान तब होता है, जब  वात, पित्त, कफ समान हो या सम हो।

स्रोत:
स्वदेशी चिकित्सा - दिनचर्या-ऋतुचर्या के आधार पर (भाग - १)
संकलन एवं संपादन: राजीव दिक्षित

नोट: इस पुस्तक को खरीदने के लिए राजीव दिक्षित मेमोरियल स्वदेशी उत्थान संस्था से संपर्क करें।